Muzaffarpur में बिना सड़क बनाए 28 करोड़ लेकर फरार हुई थी कंपनी, 6 साल से दबी हुई कार्रवाई

बिना सड़क बनाए 28 करोड़ रुपये लेकर फरार हुई निर्माण कंपनी के खिलाफ नगर थाने में दर्ज केस में पुलिस एफआईआर से आगे नहीं बढ़ पाई। हालांकि पुलिस का कहना है कि दो-दो बार पुलिस अधिकारी बंगलोर गई, लेकिन कंपनी के कार्यालय का सुराग नहीं मिल सका।




कंपनी ने आरईओ मुजफ्फरपुर से टेंडर लेने के वक्त गारंटी राशि के रूप में 3.81 करोड़ रुपए का बैंक पेपर जमा कराया था। यह राशि भी बैंक से निकाल ली गई थी। इस बैंक के तीन अधिकारियों को भी एफआईआर में नामजद किया गया था। लेकिन, आरोपियों के संबंध में भी पुलिस को बंगलोर से सुराग नहीं मिल पाया। सीजेएम न्यायालय में इस मामले में अगामी 27 नवंबर को सुनवाई होनी है। न्यायालय में हर तीन माह पर सुनवाई के लिए तिथि पड़ रही है।


इस तरह कंपनी के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई छह साल से लटकी पड़ी है। आईजी गणेश कुमार और एसएसपी जयंतकांत इस कांड की समीक्षा कर चुके हैं। आरईओ के कार्यपालक अभियंता ज्ञान भास्कर ने बताया कि जेएसआर कंस्ट्रेक्शन कंपनी प्रा.लि. को ग्रामीण कार्य विभाग मुजफ्फरपुर पूर्वी अनुमंडल की सड़कों के 11 ग्रुप के निर्माण का टेंडर मिला था। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क निर्माण योजना की करीब 60 सड़कों का इस कंपनी को निर्माण कराना था। इसमें कुछ सड़कों का काम कराया और शेष को अधूरा छोड़ दिया। निर्माण के दौरान हुए भुगतान का हिसाब किया गया। इसमें करीब 28.94 करोड़ रुपए अधिक भगुतान ले लेने का दावा विभाग ने किया था। बताया कि कार्य कराए बगैर फरार हो चुकी कंपनी से राशि वसूली के लिए अलग से केस दर्ज कराया गया था। नीलामवाद में भी मामला चल रहा है, जो सुनवाई के अधीन ही है।


तत्कालीन कार्यपालक अभियंता विजयशील कश्यप ने नगर थाने में 21 जुलाई 2015 को कंपनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। इसमें आरोप लगाया था कि कंपनी ने गारंटी राशि के रूप में 3.81 करोड़ रुपए का बंगलोर के रल्लाराम मिशन रोड स्थित कॉरपोरेशन बैंक का पेपर जमा कराया था। यह राशि बैंक के अधिकारियों ने संवेदक से मिलीभगत कर विभाग को सूचना दिए बगैर ही निकासी कर ली। इस तरह एफआईआर में बैंक के सहायक महाप्रबंधक और संवेदक को आरोपी बनाया गया था। बता दें कि अधूरी पड़ी सड़कों का 2017 में नए सिरे से टेंडर हुआ था। इसमें निर्माण लागत दोगुनी हो गई थी।


बदल चुके हैं सात आईओ :
इस केस में 21 जुलाई 2015 से अब तक 7 आईओ बदल चुके हैं, लेकिन कार्रवाई अधूरी ही पड़ी है। अभी एएसआई कुंदन कुमार को केस का चार्ज सौंपा गया है। आरोपियों के नाम-पते का भी सत्यापन नहीं हो सका है। आईजी ने बातया कि पूर्व में की गई समीक्षा में दिए गए निर्देश पर क्या कार्रवाई हुई, यह फिर से समीक्षा होने पर पूछा जाएगा। सरकारी राशि के गबन का मामला है, इसमें त्वरित गति से अनुसंधान किया जाना है।

INPUT: hindustan

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