तैयार हाेने से पहले ही लाल हुई शाही लीची, तीखी धूप-पछिया हवा से जलने लगे थे छिलके, फल का आकार बढ़ा ताे फटने लगे फल

आमताैर पर 15 मई के बाद पकनेवाली शाही लीची इस बार अभी से लाल हाेने लगी है। इसकी वजह अप्रैल में लगातार तापमान का बढ़ते रहना और पछिया हवा का चलना है। दरअसल, मंजर में दाना बनने से लेकर फल का विकास हाेने की पूरी अवधि में बारिश नहीं हुई। इस कारण फलाें का आकार अब तक छाेटा ही रह गया और 30 फीसदी से अधिक फलाें के छिलके जल गए। इस बीच 29 अप्रैल व 2 मई काे हुई बारिश के कारण शाही लीची पकने से पहले ही लाल हाेकर फटने लगी है।

वैसे बारिश के बाद बचे हुए फलाें का विकास भी तेजी से हाेने लगा है और शीघ्र ही यह बाजार में आनेवाली है। लेकिन, किसान बचे हुए फलाें काे कीटाें से बचाने के लिए बोरान व कीटनाशी दवाओं थीयाक्लोप्रिड 21% एससी या नोवाल्यूरान 10 ईसी काे पानी में मिलाकर छिड़काव करें। अन्यथा, भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है।

चाइना लीची के पेड़ों की भी करते रहें सिंचाई
दैनिक भास्कर की टीम ने बुधवार काे जब शहर के आसपास समेत मुशहरी, बाेचहां व कांटी का मुआयना किया ताे अधिकतर बागानाें में लाल-लाल फल दिखे। किसानाें ने कहा कि दाे वर्षाें से लीची एक ताे काफी देर से पकी और पकते ही कीड़े लगने से काफी नुकसान हुआ। इस बार छिलके फटने लगे और 15 दिन पहले ही लीची लाल हाे गई है। लीची किसान भाेलानाथ झा व मुशहरी के संटू प्रसाद ने कहा कि इस वर्ष पर्याप्त मंजर आने और दाना निकलने तक सब कुछ ठीक रहा।

लेकिन, 12 अप्रैल से ही तापमान बढ़ते हुए 40 डिग्री तक पहुंच जाने के कारण छिलके जलने के साथ-साथ डंठल भी सूखने लगे। अब जब बारिश हुई ताे फल तेजी से फट रहे और पल्प बाहर निकल गए हैं। उधर, राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के निदेशक डाॅ. एसडी पांडेय ने कहा कि चाइना किस्म की लीची काे बचाने के लिए भी पाैधाें में सिंचाई के साथ-साथ यूरिया व पोटाश का छिड़काव करें।

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